प्रचलित कथा के अनुसार, एक बार एक गरीब तथा रोगग्रस्त व्यक्ति (जिसे सूरज सिंह या भाई बुद्धू जी नाम से जाना जाता है) ने श्री गुरु अर्जन देव जी से दुखों से मुक्ति का उपाय पूछा। गुरु जी ने उन्हें यह बाणी (बावन अखरी के विशेष शब्द) सुनाए और नित्य पाठ करने को कहा। जैसे ही उस व्यक्ति ने श्रद्धापूर्वक इस बाणी का जाप किया, उसके सारे कष्ट समाप्त हो गए। तब से इस बाणी का नाम ‘Dukh Bhanjani Sahib’ पड़ गया।
उसके गाँव के लोग भी रोहन के परिवर्तन को देखकर आश्चर्यचकित थे और उन्होंने भी "दुख भंजनी साहिब" के बारे में जानने की इच्छा जताई। रोहन ने उन्हें भी इस ग्रंथ के बारे में बताया और उन्हें इसे पढ़ने के लिए प्रोत्साहित किया।
एक छोटे से गाँव में एक व्यक्ति रहता था जिसका नाम था रोहन। वह एक बहुत ही धार्मिक और सच्चा व्यक्ति था। वह हमेशा अपने जीवन में सुख और शांति की तलाश में रहता था, लेकिन उसके जीवन में कई उतार-चढ़ाव आते रहे।
एक दिन, रोहन ने एक पुराने और पवित्र ग्रंथ "दुख भंजनी साहिब" के बारे में सुना। यह ग्रंथ सिख धर्म का एक महत्वपूर्ण हिस्सा है और इसमें भगवान की स्तुति और जीवन के दुखों को दूर करने के लिए प्रार्थना की जाती है।
सिख धर्म का एक अत्यंत पवित्र और शक्तिशाली बाणी (गुरबाणी) है। यह शब्द डुख (दर्द, कष्ट, परेशानी) और भंजन (नाश करने वाला) से मिलकर बना है – अर्थात, ‘दुखों को दूर करने वाली बाणी’। मान्यता है कि इस बाणी के नियमित पाठ से शारीरिक, मानसिक और आध्यात्मिक सभी प्रकार के कष्टों का निवारण होता है।
जैसे ही रोहन ने "दुख भंजनी साहिब" को पढ़ना शुरू किया, उसने महसूस किया कि उसके दिल में एक शांति और सुकून आ रहा है। वह ग्रंथ की हर एक पंक्ति को ध्यान से पढ़ता और उसके अर्थ को समझने की कोशिश करता।
यह बाणी केवल सिख समुदाय तक ही सीमित नहीं है, बल्कि किसी भी धर्म या जाति के व्यक्ति इसका पाठ कर सकते हैं। इसके प्रमुख लाभ इस प्रकार हैं:


